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पारले-G ‘खाए जाओ-खाए जाओ’ , लॉकडाउन में बिक्री के मामले में टूटा 82 साल का रिकॉर्ड

  • पारले प्रोडक्ट्स की देशभर में कुल 130 फैक्ट्रियां हैं, इनमें से 120 में लगातार उत्पादन हो रहा था
  • लॉकडाउन के दौरान सिर्फ पारले-जी ही नहीं, बल्कि अन्य बिस्किट कंपनियों के प्रोडक्ट्स भी खूब बिके
  • पारले-जी की 1938 से ही घरों में जाना पहचाना ब्रांड; मार्च, अप्रैल और मई में बिस्किट की सबसे ज्यादा बिक्री हुई

नई दिल्ली: 82 साल पहले जिस बिस्किट को बनाने की शुरुआत हुई थी वो आज भी लोगों की पसंद बना हुआ है. कोरोना काल में लोगों ने PARLE- G की खूब खरीददारी की. आम लोगों में इस बिस्किट की बहुत लोकप्रियता है. आज भी इस बिस्किट की भारत के ग्रामीण अंचल में खूब पहुंच है और लोग इसको बड़े चाव के साथ खाते है. बताया गया है कि लॉकडाउन के दौरान पारले-जी बिस्कुट की इतनी अधिक बिक्री हुई है कि पिछले 82 सालों का रिकॉर्ड टूट गया है.

 

पिछले तीन महीनों में पारले ने बनाया कीर्तिमान ,मार्केट शेयर में 5 फीसदी का इजाफा

पारले प्रोडक्ट्स के कैटेगरी हेड मयंक शाह ने मीडिया को बताया कि बीते तीन महीनों में लॉक डाउन की अवधि में कंपनी का कुल मार्केट शेयर करीब 5 फीसदी बढ़ा है और इसमें से 80-90 फीसदी ग्रोथ पारले-जी की सेल से हुई है. इसका सबसे बड़ा कारण ये रहा है कि लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर पैदल चलकर घर जा रहे थे तब रास्ते में उन्हें ये बिस्किट बहुत सही लगा. एक तो ये बिस्किट सस्ता भी है और इसको खाने से ग्लूकोज़ भी मिलता है. एक तथ्य ये भी है कि कई लोगों ने पैदल चल रहे मजदूरो की मदद करने के लिए उनमे इसी बिस्किट का वितरण किया.

देशभर में 130 फैक्ट्री

पारले प्रोडक्ट्स की देश भर में कुल 130 फैक्ट्रियां हैं, इनमें से 120 में लगातार उत्पादन हो रहा था। वहीं, 10 कंपनी के स्वामित्व वाली जगह हैं। पारले-जी ब्रांड 100 रुपए प्रति किलो से कम वाली कैटेगिरी में आता है। बिस्किट उद्योग में एक तिहाई कमाई इसी से होती है। वहीं, कुल बिस्किट की बिक्री में इसका शेयर 50 फीसदी है।

 

 

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